बुधवार, 3 अक्टूबर 2012
आत्मविश्वास से संपन्न की परीक्षा
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जब वापस न आया मेरा जैमी
@ मृदुल तिवारी
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एक कुत्ता था मेरे पास कभी.. उन दिनों मुझे राहुल द्रविड़ का खेल बहुत बुरा लगता था. तो उसके ही नाम पर मैंने अपने कुत्ते न नाम जैमी रख दिया, जो धीरे धीरे बदलकर जैम हो गया. एक छोटे से पिल्ले से कब वो एक बड़ा शानदार कुत्ता बन गया पता ही नहीं चला. देखने में वो खतरनाक लगता था. पर था बहुत शांत. मेरा उससे लगाव कुछ ज्यादा ही था, और उसका मुझसे. मेरे शब्दों के साथ-साथ वो मेरे इशारे तक समझता था. मैं उसके मुह में हाथ डालकर ब्रेड का टुकडा भी निकाल लूँ तो उसे कोई ऐतराज़ नहीं होता था. घर की छत पर मैंने उसका एक छोटा सा घर बनाया था जो की परदे से ढका रहता था. मुझे उसे कभी जंजीर बांधकर टहलाने ले जाने की जरूरत नहीं हुई. वो कहीं भी हो मेरी एक आवाज़ पर वो मेरे पीछे होता था. एक बार उसके पिछले पैर में कोई दिक्कत हुई. वो लंगड़ा कर चलने लगा था. अगले ही दिन मैंने एक पशुचिकित्सक को घर बुलाया. जैम को सारे इंजेक्शन उन्ही के
द्वारा लगाए जाते थे. रात का वक़्त था, उन्हें लगा शायद कोई अंदरूनी चोट है. उन्होंने जैम को उनकी
क्लीनिक पर रात के लिए छोड़ देने को कहा. शायद वो उसका x-ray करना
चाहते थे. जैम इस तरह कभी किसी अनजानी जगह रात भर नहीं रहा था. पर मैं फिर भी उसे
क्लीनिक पर छोड़ आया.
रात के करीब २ बजे एक फ़ोन से मेरी आँख खुली. फ़ोन उसी क्लीनिक से
था, पता चला की मेरा कुत्ता रातभर सबको परेशान करता रहा और
अभी अभी जंजीर तुड़ाकर कहीं भाग गया. मैं और मेरी भतीजी उसी वक़्त से घर के बाहर
खड़े जैम के वापस आने का इन्तजार करने लगे. सुबह हो गई पर जैम नहीं आया. क्लीनिक घर
से ७-८ किलोमीटर की दूरी पे था. सबने यही कहा की जानवर अपने घर लौट ही आते है,
परेशान न हो वो भी आ जायेगा. मैंने उसे अगले कई दिनों तक ढूँढा. पर
कोई पता नहीं चला. फिर ये लगने लगा की शायद उसे किसी ने अपने घर में रख लिया है या
उसके साथ कुछ बुरा हो गया है.
इस घटना को अब १ महीना हो चुका था. उसके बर्तन उसकी जंजीर अब भी
मैंने उसके घर में संभाल के रख रक्खे थे. एक दिन घर में कोई नहीं था, मेन गेट भी खुला था. मैं अन्दर वाले कमरे में था की अचानक एक जानी पहचानी आवाज
से मै चौक गया. मेरे बाहर आने से पहले ही जैम मुझपर कूद चुका था. वो बुरी तरह कीचड़
में सना हुआ था. और मेरे सफ़ेद कपड़ों को भी उसने लिपट लिपट कर उसी रंग का कर दिया.
कीचड़ में सराबोर हम दोनों उस वक़्त शायद काफी गंदे नज़र आ रहे हों. पर जो आनंद हम
दोनों उस वक़्त महसूस कर रहे थे उसको बता पाना मुश्किल है.
@ मृदुल तिवारी
आइये यादों के आनंद में सराबोर हों..
प्रत्येक व्यक्ति
अपने जीवन में बहुत सी घटनाओं, बहुत से
क्रिया-कलापों, बहुत से एहसासों, अनेक
कार्यों, कई सारे अनुभवों से गुजरता है..इन सबका मिलाजुला असर
देखने को भी मिलता है..कई बार मीठा सा, पसंद करने वाला और कई
बार खट्टा सा, कुछ-कुछ निराश सा करने वाला...बहुत सी बातों
को हम चाह कर भी भुला नहीं पाते..वे यादों के रूप में हमारे साथ सदा-सदा को रहतीं
हैं.
कई बार ये यादें हमें हंसाली हैं, गुदगुदाती हैं तो कई बार रुलाती हैं, एक कसक सी जगाती हैं...हम सब आये दिन अपने दिल के हाथों वशीभूत होकर अपनों के बीच इन खट्टी-मीठी यादों को बांटते रहते हैं..
इस समूह का उद्देश्य भी यही है कि हम अपनी इन खट्टी-मीठी यादों को आपस में बाँट कर कभी आँखों में ख़ुशी की चमक भर दें तो कभी इन्हें साथ-साथ नम भी करें.... स्मृति वन में विचरण करते हुए कई बार हमें सुगन्धित पुष्प भी मिलेंगे तो किसी मोड़ पर काँटों की चुभन का एहसास भी होगा.....
कुछ भी हो साथ में स्मृति वन में टहलने का, विचरने का अपना ही आनंद है.....आइये हम सब साथ मिलकर इस आनन्द को उठायें...
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